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दासता-ऐ-हलधर 🤕

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 है ख़ता इतनी कि_ हम १ किसान है //            जेठ की दोपहरी में_ हल चला रहा हूँ में,      बादलों को देखकर _ खाद ला रहा हूँ में,        हो जाये बारिश 🌧 वस ये मेरा अरमान हैं ।                                                   है ख़ता इतनी..........(१) देख उगते बीज_भर जाता है दिल मेरा, *निद्दं देता हूँ उन्हें_हो जाये झट से वो बड़ा, लहलहा उठे अब ये फसल_*खुदा का अहसान है ।।        है ख़ता इतनी कि_ हम १ किसान है /- प्रकृति पुत्र:- धारा एस. पाकड़ ✍️✍️ (नीद्दं- निंदाई-गुड़ाई से फसल की खरपतवार निकालना (ख़ुदा- प्रकृति & बरसात ☔️ 

अब वो सावन ना रहे ✍️

अब वो सावन ना रहे... ना रही नदियाँ,ताल,वन कहा गये बगीचे वो उपवन, वो कुतली* कैरी अब नही । पेड़ों पे खेल अब ना रहे...................अब वो सावन (१) वो नींम के पेड़ की ठंडी छाँव, वह तपती दोपहरी में नंगे पाँव, वो कुम्हार के मटके का ठंडा पानी, वो बर्फ़*के गोले अब ना रहे..............अब वो सावन (२) ✍️धारा एस़. पाकड़